“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

16 Somvar Vrat Katha

वैसे श्रावण मास का प्रत्येक दिन पवित्र माना जाता है, पर सोमवार को विशेष पूजा होती है। पौराणिक मान्यता है कि श्रावण मास में हुए समुद्र मंथन से निकले हलाहल का पान सोमवार को ही शिव ने किया था। शिव अपने सिर पर सोम (चंद्रमा) को धारण करते हैं। पहली सोमवारी को ले व्रत व पूजन की घर-घर में तैयारी है।
कैसे रखें सोमवारी व्रत
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार सोमवार व्रत के तीन प्रकार हैं। सोमवार, सोलह सोमवार, सौभ्य प्रदोष। परंतु व्रत को श्रावण मास में आरंभ करना शुभ माना जाता है। व्रत सोमवार सूर्योदय से प्रारंभ होकर तीसरे पहर तक रखा जाता है। कुछ भक्त सूर्योदय से सूर्यास्त तक निर्जला रहते हैं। कुछ फलाहार करते हैं तो कुछ नमक रहित भोजन। सोमवार व्रत की कथा सुनी जाती है, आरती व प्रसाद वितरण किया जाता है। गौरक्षणी की इंदु देवी कहती हैं विगत 25 वर्षो से सोमवारी व्रत रख रही हैं। इससे शिव की कृपा बनी रहती है। कालीस्थान के ओमप्रकाश सिंह कहते हैं सोमवारी व्रत से नयी उर्जा व शक्ति मिलती है।
सोमवार व्रत कथा-
एक समय श्री भूतनाथ महादेव जी मृत्युलोक में विवाह की इच्छा करके माता पार्वती के साथ पधारे। विदर्भ देश की अमरावती नगरी जो कि सभी सुखों से परिपूर्ण थी वहां पधारे. वहां के राजा द्वारा एक अत्यंत सुन्दर शिव मंदिर था, जहां वे रहने लगे. एक बार पार्वती जी ने चौसर खलने की इच्छा की. तभी मंदिर में पुजारी के प्रवेश करन्बे पर माताजी ने पूछा कि इस बाज़ी में किसकी जीत होगी? तो ब्राह्मण ने कहा कि महादेव जी की. लेकिन पार्वती जी जीत गयीं. तब ब्राह्मण को उन्होंने झूठ बोलने के अपराध में कोढ़ी होने का श्राप दिया. कई दिनों के पश्चात देवलोक की अपसराएं, उस मंदिर में पधारीं, और उसे देखकर कारण पूछा. पुजारी ने निःसंकोच सब बताया. तब अप्सराओं ने ढाढस बंधाया, और सोलह सोमवार के व्रत्र रखने को बताया. विधि पूछने पर उन्होंने विधि भी उपरोक्तानुसार बतायी. इससे शिवजी की कृपा से सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं.फ़िर अप्सराएं स्वर्ग को चलीं गयीं. ब्राह्मण ने सोमवारों का व्रत कर के रोगमुक्त होकर जीवन व्यतीत किया. कुछ दिन उपरांत शिव पार्वती जी के पधारने पर, पार्वती जी ने उसके रोगमुक्त होने का करण पूछा. तब ब्राह्मण ने सारी कथा बतायी. तब पार्वती जी ने भी यही व्रत किया, और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. उनके रूठे पुत्र कार्तिकेय जी माता के आज्ञाकारी हुए. परन्तु कार्तिकेय जी ने अपने विचार परिवर्तन का कारण पूछा. तब पार्वती जी ने वही कथा उन्हें भी बतायी. तब स्वामी कार्तिकेय जी ने भी यही व्रत किया. उनकी भी इच्छा पूर्ण हुई. उनसे उनके मित्र ब्राह्मण ने पूछ कर यही व्रत किया. फ़िर वह ब्राह्मण विदेश गया और एक राज के यहां स्वयंवर में गया. वहां राजा ने प्रण किया था, कि एक हथिनी एक माला, जिस के गले में डालेगी ,वह अपनी पुत्री उसी से विवाह करेगा. वहां शिव कृपा से हथिनी ने माला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी. राजा ने उससे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया. उस कन्या के पूछने पर ब्राह्मण ने उसे कथा बतायी. तब उस कन्या ने भी वही व्रत कर एक सुंदर पुत्र पाया. बाद में उस पुत्र ने भी यही व्रत किया और एक वृद्ध राजा का राज्य पाया.
जल अर्पण का महत्व
सोमवार को शिवलिंग पर जल अर्पण का विशेष महत्व है। समुद्र मंथन से निकले हलाहल का पान करने से शिव का कंठ नीला पड़ा गया था। विष की उष्णता को शांत करने के लिए समस्त देवी-देवताओं ने शिव पर जल अर्पण किया। तभी से जल अर्पण की परंपरा है।
शिव की पूजा विधि
शिव की पूजा में जल, दूध, मधु, घी, पंचामृत, बेलपत्र, फूल, धतूरा, वस्त्र, चंदन, रोली, अक्षत, विजया, कमल
गट्टा, पान, सुपारी, लौंग, पंचमेवा चढ़ाया जाता है। कपूर, धूप, दीया से आरती की जाती है। मान्यता है कि सोमवार को दुग्ध चढ़ाने पर मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
 
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