“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

History of Lohri Festival (लोहड़ी की कथा)

2015-10-01 08:41:23, comments: 0


लोहरी का त्यौहार उमंग और उत्साह का प्रतीक है। इस अवसर पर लोग सारे देश में किसी न किसी रूप में अपने उमंग और उत्साह को प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रदर्शन को पर्व का रूप देकर अलग अलग भागों में भिन्न -भिन्न नामों से मनाया जाता ।
मकड़ संक्रांति के पूर्व संध्या पर मनाया जाने वाला यह उत्सव पंजाब का प्रमुख पर्व लोहरी के रूप में मनाया जाता है। दक्षिण भारत में यह पर्व पौंगल के रूप में मनाया जाता है। 
खास कर जिसके घर में नवविवाहित जोड़े होते हैं उनके घर की ख़ुशी तो और भी कई गुना बढ़ जाती है। क्योंकि यह प्रथा इस पर्व के महत्व से जुड़ा हुआ है।
बच्चे इस अवसर पर कंड्डे और लकड़ी जमा करते हैं ,जिनके घर में नई नई शादी होती है बच्चे उनके घरों से पैसे आदि लेकर मूंगफली ,गज्जक ,गुर पट्टी आदि खरीदते हैं। आग के अलाव जलाकर उसके चारों ओर भांगड़ा करते हैं। जलती हुई आग में तिल गुड और मूंगफली आदि का भोग लगाते हैं और उपस्थित लोगों को भी मूंगफली ,रेवड़ी आदि बांटते हैं। लोहरी की कथा 
कहा जाता है की सुंदरी और मुनरी नाम की दो बहनें थी। बचपन में ही उनके माता -पिता का स्वर्गवास हो गया था। जवान होने पर उनके चाचा उन्हें किसी राजा के हाथों बेच देना चाहते थे।
इसकी जानकारी दुल्ला भट्टी नामक एक डाकू को हुआ। दुल्ला भट्टी ने जालिमों से इन बच्चियों को बचाकर जंगल में लाया और उनके पिता बनकर उनका विवाह योग्य वर से वहीं आग जलाकर के सात फेरे करवाये। चुकि शादी जल्दी में हुई ,दुल्ला को उस समय देने के लिए कुछ भी नही था अतः लड़कियों के आँचल में एक एक सेर गुड डालकर विदा किया। 
तबसे लोहरी को त्यौहार, उत्सव इस के रूप में मनाने की प्रथा चली आ रही है। जिसे पुरे देश में हर्षोलास के साथ मनाया जाता है। 

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