“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

​बार-बार गिर रही थी एक दीवार, सपने में आईं लक्ष्मीजी और बताया ये उपाय।​

2017-10-16 18:56:48, comments: 0


देवी लक्ष्मी की आराधना का पर्व दीपावली आने वाला है। इसक मौके पर हम आपको मुंबई के फेमस महालक्ष्मी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।​ ऐतिहासिक और आश्चर्य में डाल देने वाले इस मंदिर के निर्माण की कहानी बेहद दिलचस्प है। इस मंदिर के छोटे स्वरुप का निर्माण सबसे पहले एक ब्रिटिश इंजीनियर के निर्देश पर किया गया था। एक दीवार बनवाने के दौरान उसके सपने में एक दिन लक्ष्मी जी आईं और समुद्र में पड़ी अपनी प्रतिमा का पता बताया। जिसके बाद ब्रिटिश इंजीनियर ने वह प्रतिम खोजी और यहां लक्ष्मी जी का एक छोटा मंदिर बनवाया। इस मंदिर का व्यापक निर्माण साल 1831 में धाकजी दादाजी नाम के व्यापारी ने कराया था। लक्ष्मी जी ने खुद बताया समुद्र में पड़ी अपनी प्रतिमा का पता....

- मुंबई के भूलाभाई  देसाई मार्ग पर समुद्र के किनारे स्थित इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि जहां यह मंदिर बना है वहां पहले वर्ली और मालाबार हिल (वह क्षेत्र जिसे अब ब्रीच केंडी कहा जाता है) को जोड़ने वाली दीवार बन रही थी।
- जिस दौरान निर्माण कार्य चल रहा था, उस दौरान वह दीवार बार-बार गिर जा रही थी। ब्रिटिश इंजीनियर्स के सारे प्रयास बेकार जा रहे थे।
- जनश्रुति है कि तब प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर को सपने में महालक्ष्मी माता ने दर्शन दिए और कहा कि वर्ली के पास समुद्र में तुम्हें मेरी मूर्ति दिखाई देगी। तुम इसको निकाल कर यहां मंदिर बनवाओ।
- माता के निर्देशानुसार खोज करने पर ये मूर्ति उसी जगह मिल गई। इस घटना के बाद चीफ इंजीनियर ने इसी जगह पर एक छोटे से मंदिर का निर्माण करवाया और उसके बाद दीवार का निर्माण कार्य बड़ी आसानी से संपन्न हो गया।

मंदिर में यह है खास
- समुद्र के किनारे बसा होने की वजह से मंदिर की सुंदरता और बढ़ जाती है।
- मंदिर के अंदर देवी महालक्ष्मी, देवी महाकाली और देवी महासरस्वती की प्रतिमाएं स्थित हैं।
- तीनों ही मूर्तियां नाक में नथ, सोने की चूड़ियां और मोती के हार से सुसज्जित हैं।
- महालक्ष्मी माता की मूर्ति में माता को शेर पर सवार होकर महिषासुर का वध करते हुए दिखाया गया है। नवरात्र में मंदिर में माता के दर्शन के लिए लोगों को अपनी बारी का घंटों इंतजार करना पड़ता है।

मंदिर के पीछे चिपकाए जाते हैं सिक्के
- मान्यता के अनुसार, मंदिर के पीछे की दीवार पर लोग मनौती के सिक्के चिपकाते हैं। यहां हजारों सिक्के अपने आप चिपक जाते हैं।
- मंदिर के पीछे की तरफ कुछ सीढ़ियां उतरने के बाद समुद्र का सुंदर नजारा देखा जा सकता है।


नहीं होते असली मूर्ति के दर्शन
- जो लोग महालक्ष्मी देवी के दर्शन अभी जिस रूप में करते हैं वह वास्तविक प्रतिमा के दर्शन नहीं हैं।
- तीनों माताओं के असली स्वरुप सोने के मुखौटों से ढंके हुए हैं। मंदिर में विराजमान देवी महालक्ष्मी की मूर्ती स्वयम्भू है।
- वास्तविक मूर्ति को बहुत कम लोग देख पाते हैं, असली मूर्ती के दर्शन करने के लिए आपको रात में लगभग 9:30 बजे मंदिर में जाना होता है।
- इस समय मूर्तियों पर से आवरण हटा दिया जाता है तथा 10 से 15 मिनट के लिए भक्तों के दर्शन के लिए मूर्तियों को खुला ही रखा जाता है और उसके बाद मंदिर बंद हो जाता है।
- सुबह 6 बजे मंदिर खुलने के साथ ही माता का अभिषेक किया जाता है तथा उसके तत्काल बाद ही मूर्तियों के ऊपर फिर से आवरण चढ़ा दिए जाते है।

Categories entry: Temple, story / History
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