“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

​पाताल लोक से जुड़ा भगवती दुर्गा मंदिर (दुर्गाकुंड, वाराणसी)​

2017-12-14 17:00:04, comments: 0


पाताल लोक से जुड़ा भगवती दुर्गा मंदिर (दुर्गाकुंड, वाराणसी)

शुम्भ-निशुम्भ का वध करने के बाद मां ने यहीं किया था विश्राम
मां का है इतना तेज कि मात्र दर्शन से ही भस्म हो जाते हैं कई जन्मों के पाप
वाराणसी. भोले नगरी से मशहूर इस काशी के पावन भूमि पर कई देवी मंदिरों का भी बड़ा महात्मय है। यहां दुर्गाकुण्ड में मां दुर्गा का भव्य एवं विशाल मंदिर है। जहां हर समय दर्शनार्थियों का आना लगा रहता है। ख़ासकर नवरात्र में तो इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। शारदीय नवरात्र के चौथे दिन मां को कुष्माण्डा माता के रूप में पूजा जाता है। इस दौरान मंदिर को भव्य तरीक़े से सजाया जाता है। इस मंदिर में देवी का तेज इतना भीषण है मां के सामने खड़े होकर दर्शन करने मात्र से ही कई जन्मों के पाप जलकर भस्म हो जाते हैं।

भारतीय संस्कृति में मां दुर्गा को सृजनात्मक शक्ति, मातृ शक्ति व दिव्य शक्ति के रूप में प्रतिष्थापित किया गया है। शक्ति ही चेतना है, सौन्दर्य है और इसी में संपूर्ण विश्व निहित है। शक्ति के इसी महत्व के कारण मां आद्य शक्ति अपने तीन मूल स्वरूपों महालक्ष्मी, महासरस्वती व महाकाली के माध्यम से विश्व की समूची ऐश्वर्य संपदाओं की स्वामिनी, विद्याओं की अधिष्ठात्री व समस्त शक्तियों की मूलाधार मानी गई हैं। बाबा भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी विश्व की तीन लोक से न्यारी काशी में मां आद्य शक्ति अदृश्य रूप में दुर्गाकुंड मंदिर में विराजमान हैं। माता का यह सिद्ध मंदिर बाबा भोलेनाथ की नगरी का प्राचीनतम मंदिर माना जाता है। मान्यता है कि यह मंदिर आदिकालीन है। आदिकाल में काशी में तीन ही मंदिर थे- श्री काशी विश्वनाथ, मां अन्नपूर्णा और दुर्गा मंदिर।

इस मंदिर का निर्माण 1760 ई0 में रानी भवानी ने कराया था। उस समय मंदिर निर्माण में पचास हजार रुपये की लागत आई थी। मान्यता है कि शुम्भ-निशुम्भ का वध करने के बाद मां दुर्गा ने थककर दुर्गाकुण्ड स्थित मंदिर में ही विश्राम किया था। दुर्गाकुण्ड क्षेत्र पहले वनाच्छादित था। इस वन में उस समय काफी संख्या में बंदर विचरण करते थे। धीरे-धीरे इस क्षेत्र में आबादी बढ़ने पर पेड़ों के साथ बंदरों की संख्या भी घट गई। मां दुर्गा का यह मंदिर नागर शैली में निर्मित किया गया। इस मंदिर स्थल पर माता भगवती के प्रकट होने का संबंध अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन की कथा से जुड़ा है।

मां के विरोधियों के रक्त से बना यह कुंड (दुर्गाकुंड)
राजकुमार सुदर्शन की शिक्षा-दीक्षा प्रयागराज में भारद्वाज ऋषि के आश्रम में हुई थी। शिक्षा पूरी होने के उपरान्त राजकुमार सुदर्शन का विवाह काशी नरेश राजा सुबाहू की पुत्री से हुआ। इस विवाह के पीछे रोचक कथानक है कि काशी नरेश राजा सुबाहू ने अपनी पुत्री के विवाह योग्य होने पर उसके स्वयंवर की घोषणा की। स्वयंवर दिवस की पूर्व संध्या पर राजकुमारी को स्वप्न में राजकुमार सुदर्शन के संग उनका विवाह होता दिखा। राजकुमारी ने अपने पिता काशी नरेश सुबाहू को अपने स्वप्न की बात बताई। काशी नरेश ने इस बारे में जब स्वयंवर में आये राजा-महाराजाओं को बताया तो सभी राजा सुदर्शन के खिलाफ हो गये व सभी ने उसे सामूहिक रूप से युद्ध की चुनौती दे डाली।

राजकुमार सुदर्शन ने उनकी चुनौती को स्वीकार कर मां भगवती से युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद मांगा।  राजकुमार सुदर्शन ने जिस स्थल पर आदि शक्ति की आराधना की, वहां देवी मां प्रकट हुई और सुदर्शन को विजय का वरदान देकर स्वयं उसकी प्राणरक्षा की। कहा जाता है कि जब राजा-महाराजाओं ने सुदर्शन को युद्ध के लिए ललकारा तो मां आदि शक्ति ने युद्धभूमि में प्रकट होकर सभी विरोधियों का वध कर डाला। इस युद्ध में इतना रक्तपात हुआ कि वहां रक्त का कुंड बन गया, जो वर्तमान में दुर्गाकुंड के नाम से प्रसिद्ध है। लोगों का मानना है कि इस कुंड में पानी पाताल से आता है। तभी इसका पानी कभी नहीं सूखता।

काशी नरेश राजा सुबाहू ने बनवाया था यह मंदिर
सुदर्शन की रक्षा के बाद देवी मां ने काशी नरेश को दर्शन देकर उनकी पुत्री का विवाह राजकुमार सुदर्शन से करने का निर्देश दिया और कहा कि किसी भी युग में इस स्थल पर जो भी मनुष्य सच्चे मन से मेरी आराधना करेगा मैं उसे साक्षात दर्शन देकर उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करूंगी। कहा जाता है कि उस स्वप्न के बाद राजा सुबाहु ने वहां मां भगवती का मंदिर बनवाया जो कई बार के जीर्णोद्धार के साथ आज वर्तमान स्वरूप में श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

मंदिर से जुड़ा एक अन्य कथानक इसकी विशिष्टता को प्रतिपादित करता है। घटना प्राचीन काल की है एक बार काशी क्षेत्र के कुछ लुटेरों ने इस मंदिर में देवी दुर्गा के दर्शन कर संकल्प लिया था कि जिस कार्य के लिए वह जा रहे हैं, यदि उसमें सफलता मिली तो वे मां आद्य शक्ति को नरबलि चढ़ाएंगे। मां की कृपा से उन्हें अपने कार्य में सफलता मिली और वे मंदिर आकर बलि देने के लिए ऐसे व्यक्ति को खोजने लगे जिसमें कोई दाग न हो। तब उन्हें मंदिर के पुजारी ही बलि के लिए उपयुक्त नजर आये। जब उन्होंने पुजारी से यह बात कहते हुए उनको बलि के लिए पकड़ा तो पुजारी बोले- जरा रुक जाओ जरा मैं माता रानी की नित्य पूजा कर लूं, फिर बलि चढ़ा देना।

कुक्कुटेश्वर महादेव के दर्शन के बिना नहीं फलित होती भक्तों की पूजा
पूजा के बाद ज्यों ही लुटेरों ने पुजारी की बलि चढ़ायी, तत्क्षण माता ने प्रकट होकर पुजारी को पुनर्जीवित कर दिया व वर मांगने को कहा। तब पुजारी ने माता से कहा कि उन्हें जीवन नहीं, उनके चरणों में चिरविश्राम चाहिए। माता प्रसन्न हुई और उन्होंने वरदान दिया कि उनके दर्शन के बाद जो कोई भी उस पुजारी का दर्शन नहीं करेगा, उसकी पूजा फलित नहीं होगी। इसके कुछ समय बाद पुजारी ने उसी मंदिर प्रांगण में समाधि ली, जिसे आज कुक्कुटेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

पौराणिक मान्यता के मुताबिक जिन दिव्य स्थलों पर देवी मां साक्षात प्रकट हुईं वहां निर्मित मंदिरों में उनकी प्रतिमा स्थापित नहीं की गई है ऐसे मंदिरों में चिह्न पूजा का ही विधान हैं। दुर्गा मंदिर भी इसी श्रेणी में आता है। यहां प्रतिमा के स्थान पर देवी मां के मुखौटे और चरण पादुकाओं का पूजन होता है। साथ ही यहां यांत्रिक पूजा भी होती है। यही नहीं, काशी के दुर्गा मंदिर का स्थापत्य बीसा यंत्र पर आधारित है। बीसा यंत्र यानी बीस कोण की यांत्रिक संरचना जिसके ऊपर मंदिर की आधारशिला रखी गयी है।

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