“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

*ॐ त्र्यंबकम् मंत्र* के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं।

2017-07-23 13:02:11, comments: 0


*ॐ त्र्यंबकम् मंत्र* के 33 अक्षर हैं
जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं।
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है

जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं ।
साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है

महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।

• *त्रि* - ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
• *यम* - अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
• *ब* - सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
• *कम* - जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
• *य* - वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
• *जा*- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
• *म* - प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
• *हे* - प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
• *सु* -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
• *ग* -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
• *न्धिम्* -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
• *पु*- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
• *ष्टि* - अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
• *व* - पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
• *र्ध* - भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
• *नम्* - कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित है।
• *उ*- दिक्पति रुद्र का घोतक है । यक्ष जानु में स्थित है।
• *र्वा* - स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
• *रु* - भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
• *क* - धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
• *मि* - अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
• *व* - मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
• *ब* - वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
• *न्धा* - अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
• *नात्* - भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
• *मृ* - विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
• *र्त्यो्* - दन्दाददित्य् का बोधक है । वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
• *मु* - पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।
• *क्षी* - पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है । नाभि स्थिल में स्थित है।
• *य*- त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है । गुहय भाग में स्थित है।
• *मां* - विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
• *मृ* - प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
• *तात्*- अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं । जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग - अंग ( जहां के जो देवता या वसु *ॐ त्र्यंबकम् मंत्र* के 33 अक्षर हैं
जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं।
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है
जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं ।
साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है ।
महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।

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