“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

शिव के त्रिशूल पर टिकी है काशी (Kashi)

2016-01-31 12:38:39, comments: 0


1. भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है काशी

कहा जाता है कि इस नगर को खुद भगवान शिव ने अपने तेज से प्रकट किया था। इसलिए, यह उन्हीं का स्वरूप माना जाता है। कई ग्रंथों में काशी को शिव की नगरी के नाम से भी पुकारा गया है। प्रलय से समय इस नगर की रक्षा करने के लिए भगवान शिव ने इसे अपने त्रिशूल पर टिका कर रखा है।
 

2. प्राचीन काशी मंदिर को नष्ट कर दिया था औरंगजेब ने

कहानियों के अनुसार, काशी का मंदिर जो की आज मौजूद है, वह वास्तविक मंदिर नहीं है। काशी के प्राचीन मंदिर का इतिहास कई साल पुराना है, जिसे औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। बाद में फिर से मंदिर का निर्माण किया गया, जिसकी पूजा-अर्चना आज की जाती है।
 

3. इन्दौर की रानी ने करवाया था मंदिर का पुनर्निर्माण

काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण इन्दौर की रानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था। मान्यता है कि 18वीं शताब्दी के दौरान स्वयं भगवान शिव ने अहिल्या बाई के सपने में आकर इस जगह उनका मंदिर बनवाने को कहा था।
 

4. छत्र के दर्शन करने से पूरी होती है हर मनोकामना

मंदिर के ऊपर एक सोने का बना छत्र लगा हुआ है। इस क्षत्र के चमत्कारी माना जाता है और इसे लेकर एक मान्यता प्रसिद्ध है। अगर कोई भी भक्त इस छत्र के दर्शन करने के बाद कोई भी प्रार्थना करता है तो उसकी वो मनोकामना जरूर पूरी होती है।
 

5. कुएं में छुपाया गया था शिवलिंग

माना जाता है कि जब औरंगजेब इस मंदिर का विनाश करने के लिए आया था, तब मंदिर में मौजूद लोगों ने यहां के शिवलिंग की रक्षा करने के लिए उसे मंदिर के पास ही बने एस कुएं में छुपा दिया था। कहा जाता है कि वह कुआं आज भी मंदिर के आस-पास कहीं मौजूद है।
 

6. महाराज रणजीत सिंह ने किया था सोने का दान

रानी अहिल्या बाई के मंदिर निर्माण करवाने के कुछ साल बाद महाराज रणजीत सिंह ने मंदिर में सोने का दान किया था। कहा जाता है कि महाराज रणजीत ने लगभग एक टन सोने का दान किया था, जिसका प्रयोग से मंदिर के छत्रों पर सोना चढाया गया था।
 

7. इसलिए काशी को कहा जाता है वाराणसी

यहां पर गंगा, वरुणा और अस्सी जैसी पावन नदियां बहती हैं। यहां पर वरुणा और अस्सी नदी के बहने के कारण ही इस शहर को वाराणसी भी कहा जाता है। यह दोनों नदियां यहां से बहती हुईं, आगे जाकर गंगा नदी में मिल जाती हैं।
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