“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

रावण के तीन गुणकारी मंत्र

2017-07-23 12:50:43, comments: 0


श्री राम और रावण के बीच हुए अंतिम युद्ध के बाद रावण जब युद्ध भूमि में मरणशैय्या पर पड़ा था तब समस्त वेदों के ज्ञाता, महापंडित रावण ने लक्ष्मण को राजनीति और शक्ति का ज्ञान दिया था।
रावण ने लक्ष्मण को बताया कि-
• अच्छे कार्य में कभी विलंब नहीं करना चाहिए। और अशुभ कार्य मोह वश करना ही पड़े तो उसे जितना हो सके उतना टालने का प्रयास करना चाहिए।
• शक्ति और पराक्रम के मद में इतना अँधा नहीं हो जाना चाहिए की हर शत्रु तुच्छ और निम्न लगने लगे। मुझे ब्रह्मा जी से वर मिला था की वानर और मानव के अलावा कोई मुझे मार नहीं सकता। फिर भी मै उन्हे तुच्छ और निम्न समझ कर अहम में लिप्त रहा। जिस कारण मेरा विनाश हुआ।
• तीसरी और अंतिम बात रावण नें यह कही कि, अपने जीवन के गुण रहस्य स्वजन को भी नहीं बताना चाहिए। चूँकि रिश्ते और नाते बदलते रहते हैं। जैसे कि विभीषण जब लंका में था तब मेरा हितेच्छु था। पर श्री राम की शरण में आने के बाद वो मेरे विनाश का माध्यम बना।
इससे यही सार निकलता है कि अपने गूढ़ रहस्य अपने तक रखने चाहिए। शुभ कर्म में देरी नहीं करनी चाहिए। गलत काम से परहेज़ करना चाहिए। किसी भी शत्रु को कमज़ोर नहीं समझना चाहिए। यह अमूल्य पाठ हर एक इंसान को अपने जीवन में उतारना चाहिए।

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