“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

राजस्थान में एक ऐसा मंदिर है जहां शराब को खराब नहीं बल्कि प्रसाद माना जाता है.

2017-09-21 19:24:49, comments: 0

राजस्थान में एक ऐसा मंदिर है जहां शराब को खराब नहीं बल्कि प्रसाद माना जाता है. बाकायदा शराब को प्रसाद की तरह चढ़ाया जाता है. यह मंदिर काली माता (भंवाल माता) का है. मां एक भक्त से ढाई प्याला शराब का भोग लगाती हैं. खास बात ये है कि वे उसी भक्त की शराब का भोग लगाती हैं, जिसकी मनोकामना या मन्नत पूरी होनी होती है और वह सच्चे दिल से भोग लगाता है. अगली स्लाइडों में जानें पूरी कहानी...

आपको बता दें कि राजस्थान के नागौर जिले की रियांबड़ी तहसील के भंवाल गांव में काली माता का मंदिर है, जिसकी तामीर को 800 से ज्यादा साल हो चुके हैं. यहां नवरात्रा के मौके पर मेला लगता है, जिसमें भक्तों का सैलाब उमड़ता है. भक्त दूर-दूर से माता के दरबार में मन्नत मांगने आते हैं.

माता की एक और खास बात ये है कि वे सभी भक्तों की शराब को स्वीकार नहीं करती हैं. केवल उसी भक्त की शराब को स्वीकार करती हैं जिसकी मन्नत पूरी हो जानी होती है. मंदिर में दो मुर्तियां हैं, पहली बह्माणी माता की, जिन्हें मीठा प्रसाद चढ़ाते हैं और दूसरी काली माता की जिनको शराब चढ़ाई जाती है.

यहां हजारों भक्त अपनी मुरादें लेकर आते हैं और वे साथ में माता का भोग लगाने के लिए शराब लाते हैं. इसके बाद पुजारी माता का भोग लगाता हैं और बची हुई शराब वापस भक्त को दे देते हैं. चढी़ हुई शराब को बहुत पवित्र माना जाता है. ऐसा नहीं है कि भक्त सिर्फ मन्नत मांगने के लिए ही माता के दरबार मे आते हैं बल्कि जिन भक्तों की मुराद पूरी हो जाती है, वे भी फिर से माता का शुकराना अदा करने भंवाल आते हैं.

यही नहीं, जिस समय माता रानी पर शराब चढ़ाई जा रही हो उस समय भक्तों को इस बात का भी खास ध्यान रखना होता है कि वो चमड़े से बनी कोई चीज ना पहना हों. अगर ऐसा होता है तो माता उसकी भेट स्वीकार नहीं करती हैं.

वहीं बताया जाता है कि माता को भक्त की शराब मंजूर होती है तो प्याला खाली हो जाता है. ऐसे ही माता ढाई प्याला शराब स्वीकार करती हैं. विदेश से आए सैलानी भी माता को शराब का भोग लगाते देख हैरान रह जाते हैं.

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