“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

यहां मां पार्वती के आंसूओं में स्नान करने से होती है यात्रा सफल

2015-08-03 08:28:16, comments: 0

कुल्लू: हिमाचल प्रदेश के पर्वत शिखरों मणिमहेश, कैलाश, नीलकंठ और श्रीखंड आदि पवित्र स्थानों में प्राकृतिक रूप से झील या सरोवर बने हुए हैं। इनमें स्नान करके श्रद्धालु अपनी यात्रा को सफल मानते हैं। ऐसी झीलों में नयनसर श्रीखंड महादेव से संबंधित है। किंवदंती के अनुसार श्रीखंड को भगवान शिव का लिंग विग्रह माना जाता है। इनमें से एक नयनसर का अपना ही विशेष महत्व है। श्रीखंड को जाने वाले रास्ते के साथ लगते भीम डवारी के समीप ही नयनसर का पवित्र स्थान आता है। 


ऐसे हुआ भस्मासुर का वध
माना जाता है कि संकट के समय पार्वती ने भगवान विष्णु का आह्वान किया। भगवान विष्णु ने तुरंत पार्वती का रूप धारण कर भस्मासुर को अपनी ओर आकर्षित किया। पार्वती ने शर्त के मुताबिक भस्मासुर को अपनी ही तरह नृत्य करने को विवश किया। नाचते-नाचते पार्वती रूप में भगवान विष्णु ने अपने सिर पर हाथ फेरा, नकल करते हुए भस्मासुर का हाथ ज्यों ही सिर पर गुजरा उसी क्षण वह भस्म हो गया।


ऐसे छोड़ा नागों ने अपना स्थान 
कन्या की माता को संदेह होने लगा कि बेटी दूध लेकर कहां जाती है। एक दिन कन्या किसी काम से बाहर गई हुई थी। कन्या की माता ने जैसे ही अंधेरे कमरे में रखे पिटारे को खोला तो सांपों के फन दूध पीने के लिए लपके। इस पर कन्या की माता ने भयभीत होकर पिटारे को गर्म तवे पर पलट दिया। इससे नाग इधर-उधर भागने लगे। धुंई नाग ने धुएं के साथ वायुमंडल में प्रवेश किया। झंगोरी नाग गामूतीर होते हुए झंगोरी गया। माहू नाग मधुमक्खी बनकर उड़ गया। राई नाग अरसू चला गया। इस तरह से 9 नाग अलग-अलग स्थानों में चले गए। नागों की मां सरपारा से 4 किलोमीटर दूर काववील के साथ लगते झरने के नीचे समा गई। 


ऐसे हुआ निर्माण
कहते हैं कि प्राचीन समय में इस क्षेत्र में एक भयानक राक्षस निवास करता था। उसने शिव की घोर तपस्या की और भगवान के प्रसन्न होने पर शिव से ऐसा वरदान प्राप्त किया जिसके बल पर वह जिसके सिर पर हाथ फेरता वह जलकर भस्म हो जाता। इस वरदान का दुरुपयोग कर उसने तमाम ऋषि-मुनियों को मार गिराया। राक्षस भस्मासुर नाम से प्रख्यात हुआ। जब उसके पाप का घड़ा भरने लगा तो वह पार्वती पर आसक्त हुआ और उसे प्राप्त करने के लिए शिव को ही मारने दौड़ पड़ा। जनश्रुति के अनुसार आगे-आगे शिव और पार्वती व पीछे भस्मासुर पर्वत शिखर की ओर भाग रहे थे। यहां पहुंचते ही पार्वती थक कर भूमि पर गिर गई और रोने लगी। पार्वती के नेत्रों से जो आंसू गिरे उसी से नयनसर का निर्माण हुआ ऐसा माना जाता है। 


पार्वती ने 84 हजार वर्ष तक की थी तपस्या
यह भी माना जाता है कि जिला कुल्लू के निरमंड के पर्वत शिखरों में श्रीखंड कैलाश मार्ग में डवारी पड़ाव से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर बकासुर वध पार्वती बाग होते हुए नयनसर पहुंचते हैं। इसी क्षेत्र में पार्वती ने 84 हजार वर्ष तक भगवान शिव की तपस्या की। वर्तमान में यह स्थान पार्वती बाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। एक बार अपनी तपस्या को असफल होता देख पार्वती की आंखों में अश्रु धारा बहने लगी और उन अश्रुओं से तालाब बन गया जिसका नाम नयनसर पड़ा। हर साल हजारों की संख्या में मानव सहित देवी-देवता भी यहां शाही स्नान करते हैं। खास बात यह है कि मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर 33 करोड़ देवी-देवता अपने दिव्य रूप में यहां स्नान करने के लिए आते हैं, वहीं देवराज इंद्र की परियां भी यहां स्नान करने आती हैं, ऐसी लोक मान्यता है। 

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