“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

यहां गिरा था सती के मस्तिष्क का अगला भाग (Maa Mansa Devi Temple, Panchkula)

2017-04-02 13:17:26, comments: 0

जिला पंचकुला में ऐतिहासिक नगर मनीमाजरा के निकट शिवालिक पर्वत मालाओं की गोद में सिन्धुवन के अतिंम छोर पर प्राकृतिक छटाओं से आच्छादित एकदम मनोरम एवं शांति वातावरण में स्थित है सतयुगी सिद्घ माता मनसा देवी मंदिर। कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन से 40 दिन तक निरंतर मनसा देवी के भवन में पहुंचकर पूजा अर्चना करता है, तो मां मनसा देवी उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करती है। माता मनसा देवी का चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में मेला लगता है। माता मनसा देवी के मंदिर को लेकर कई धारणाएं व मान्यताएं प्रचलित हैं। श्रीमाता मनसा देवी का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि अन्य सिद्घ शक्तिपीठों का। इन शक्ति पीठों का कैसे और कब प्रादुर्भाव हुआ इसके बारे में शिव पुराण में विस्तृत वर्णन मिलता है। धर्म ग्रंथ तंत्र चूड़ामणि के अनुसार ऐसे सिद्घपीठों की संख्या 51 है, जबकि देवी भागवत पुराण में 108 सिद्घ पीठों का उल्लेख मिलता है, जो सती के अंगों के गिरने से प्रकट हुए।

कथा
मान्यता है कि जब माता पार्वती अपने पिता हिमालय के राजा दक्ष के घर अश्वमेध यज्ञ में बिना बुलाए चली गई, तो किसी ने उनका सत्कार नहीं किया और यज्ञ में शिवजी का भाग भी नहीं निकाला, तो आत्म सम्मान के लिए मां ने अपने आपको यज्ञ की अग्नि में होम कर दिया। जिसका पता चलते ही शिवजी यज्ञ स्थान पर पहुंचकर सती का दग्ध शरीर लेकर तांडव नृत्य करते हुए देश-देशातंर में भटकने लगे। भगवान शिव का उग्र रूप देखकर ब्रह्मादि देवताओं को चिंता हुई, तो भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से लक्ष्यभेद कर सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया। जिसके बाद विभिन्न स्थानों पर सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे वहीं शक्तिपीठों की स्थापना हुई और शिव ने कहा कि इन स्थानों पर भगवती शिव की भक्ति भाव से आराधना करने पर कुछ भी दुलर्भ नहीं होगा। पंचकूला शिवालिक गिरिमालाओं पर देवी के मस्तिष्क का अग्र भाग गिरने से मनसा देवी शक्तिपीठ देश के लाखों भक्तों के लिए पूजा स्थल बन गए हैं। इसके अलावा अनेक कथाएं श्री माता मनसा देवी मंदिर के बारे में प्रसिद्ध हैं।

इतिहास
मनीमाजरा के महाराजा गोपाल सिंह ने श्री मनसा देवी मंदिर का निर्माण करवाया था, जो पंचकुला तहसील के बिलासपुर गांव के शिवालिक तलहटी पर स्थित है। मंदिर का निर्माण सं 1811–1815 के दौरान करवाया गया था। मुख्य मंदिर से 200 km की दुरी पर एक पटियाला मंदिर स्थित है जिसका निर्माण पटियाला के महाराजा करम सिंह ने सं 1840 में करवाया था। यह मंदिर मनीमाजरा सामंती राज्य के संरक्षण के लिए किया था। PEPSU में रियासतों के विलय के पश्चात राज्य सरकार का संरक्षण समाप्त हो गया था और मंदिर पर ध्यान नहीं दिया गया था। इसके पश्चात राजा में एक पुजारी को नियुक्त किया जिनका कर्तव्य इस मंदिर में स्थित देवताओं की सेवा और पूजा अर्चना करना था।

PEPSU में रियासतों की विलय के बाद ये पुजारी मंदिर से जुड़े प्रबंधन के मामले और इसे नियंत्रित करने व् मंदिर से जुडी भूमि के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो गए। वे न तो मंदिर का रख-रखाव करते थे और न ही मंदिर में आने वाले भक्तो की आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराते थे जिसके कारण दिन प्रतिदिन मंदिर की हालत ख़राब होती जा रही थी। यहां तक की नवरात्र मेले के दौरान मंदिर में आने वाले तीर्थ यात्रियों के लिए भी मंदिर में उचित व्यवस्था नहीं थी। जिसके परिणामस्वरूप, हरियाणा सरकार ने इस मंदिर का नियंत्रण अपने हाथो में ले लिए और श्री माता मनसा देवी श्राइन बोर्ड (SMMDSB) पंचकुला ट्रस्ट की स्थापना की जो मंदिर की देखरख कर सके। इस बोर्ड की स्थापना से पहले से तक मदिर बहुत ही खराब हालत में था।

 
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