“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

महाकाली मंदिर , गंगोलीहाट

2017-09-10 05:19:21, comments: 0


गंगोलीहाट की सौन्दर्य से परिपूर्ण छटाओं के मध्य यहां से लगभग एक किमी० दूरी पर अत्यन्त ही प्राचीन माँ भगवती महाकाली का अद्भुत मंदिर को चाहे धार्मिक दृष्टि से देखें या पौराणिक दृष्टि से हर स्थिति में यह आगन्तुकों का मन मोहने में पूर्णतया सक्षम है। उत्तराखण्ड के लोगों की आस्था का केन्द्र महाकाली मंदिर अनेक रहस्यमयी कथाओं को अपने आप में समेटे हुये है।
कहा जाता है कि जो भी भक्तजन श्रद्वापूर्वक महाकाली के चरणों में आराधना के श्रद्वापुष्प अर्पित करता है उसके रोग, शोक, दरिद्रता एवं महान विपदाओं का हरण हो जाता है व अतुल ऐश्वर्य एवं सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। भक्तजन बताते हैं यहां श्रद्वा एवं विनयता से की गयी पूजा का विशेष महात्म्य है। इसलिये वर्ष भर यहां बडी संख्या में श्रद्वालु पहुंचते हैं तथा बड़े ही भक्ति भाव से बताते हैं कि किस प्रकार माता महाकालिका ने उनकी मनौती पूर्ण की देशी विदेशी पर्यटक इस क्षेत्र में आकर माँ काली के दर्शन करते हैं। महाकालिका की अलौकिक महिमा के पास आकर ही जगतगुरू शंकराचार्य ने स्वयं को धन्य माना तथा माँ के प्रति अपनी आस्था पुंज बिखेरते हुये उत्तराखण्ड क्षेत्र में अनेक धर्म स्थलों पर श्रद्धा के पुष्प अर्पित किये जिनके प्रतीत चिन्ह आज भी जागेश्वर के मृत्युंजय महादेव मंदिर, पाताल भुवनेश्वर की रौद्र शक्ति पर व कालिका मंदिर के अलावा अन्य कई पौराणिक मंदिरों एवं गुफाओं में देखे जा सकते हैं। श्री महाकाली का यह मंदिर उत्तराखण्ड के लोगों की आस्था का प्रतीक है।

महाकाली मंदिर

         प्रातःकाल मंदिर में जब महाकाली की गूंज, शंख, रूदन और नगाडों की रहस्यमयी आवाजें निकलती हैं, तत्पश्चात यहां पर भक्तजनों का ताता लगना शुरू होता है। सायंकालीन आरती का दृश्य भी अत्यधिक मन मोहक रहता है। जिसे देखकर ऐसा मालूम पड़ता है। मानों घरती पर र्स्वग उतर आया हो। कहा जाता है कि महिषासुर व चण्डमुण्ड सहित तमाम भयंकर शुम्भ निशुम्भ आदि राक्षसों का वध करने के बाद भी महाकाली का यह रौद्र रूप शांत नहीं हुआ और इस रूप ने महाविकराल धधकती महाभयानक ज्वाला का रूप धारण कर तांडव मचा दिया था। महाकाली ने महाकाल का भयंकर रूप धारण कर देवदार के वृक्ष में चढकर जागनाथ व भुवनेश्वर नाथ को आवाज लगानी शुरू कर दी। कहते हैं यह आवाज जिस किसी के कान में पड़ती थी वह व्यक्ति सीधे प्रातः तक यमलोक पहुंच चुका होता था।

  कहा जाता है कि छठी शताब्दी में आदि जगत गुरू शंकराचार्य जब अपने भारत भ्रमण के दौरान जागेश्वर आये तो शिव प्रेरणा से उनके मन में यहां आने की इच्छा जागृत हुई। लेकिन जब वे यहां पहुंचे तो नरबलि की बात सुनकर उद्वेलित शंकराचार्य ने इस दैवीय स्थल की सत्ता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और शक्ति के दर्शन करने से भी वे विमुख हो गये। लेकिन जब विश्राम के उपरान्त शंकराचार्य ने देवी जगदम्बा की माया से मोहित होकर मंदिर शक्ति परिसर में जाने की इच्छा प्रकट की तो मंदिर शक्ति स्थल पर पहुंचने से ही कुछ दूर पूर्व तक ही स्थित प्राकृतिक रूप से निर्मित गणेश मूर्ति से आगे वे नहीं बढ पाये और अचेत होकर इस स्थान पर गिर पड़े व कई दिनों तक यही पड़े रहे उनकी आवाज भी अब बंद हो चुकी थी। अपने अंहभाव व कटु वचन के लिये जगत गुरू शंकराचार्य को अब अत्यधिक पश्चाताप हो रहा था। पश्चाताप प्रकट करने व अन्तर्मन से माता से क्षमा याचना के पश्चात माँ भगवती की अलौकिक आभा का उन्हें आभास हुआ।

महाकाली मंदिर

         चेतन अवस्था में लौटने पर उन्होंने महाकाली से वरदान स्वरूप मंत्र शक्ति व योगसाधना के बल पर शक्ति के दर्शन किये और महाकाली के रौद्रमय रूप को शांत किया तथा मंत्राोचार के द्वारा लोहे के सात बड़े-बड़े भदेलों से शक्ति को कीलनं कर प्रतिष्ठिापित किया। अष्टदल व कमल से मढ़वायी गयी इस शक्ति की ही पूजा अर्चना वर्तमान समय में यहां पर होती है। बताया जाता है कि यही एक ऐसा दरबार है। जहां अमावस्या हो चाहे पूर्णिमा सब दिन हवन यज्ञ आयोजित होते हैं।
इस मंदिर के निर्माण की कथा भी बडी चमत्कारिक रही है। महामाया की प्रेरणा से प्रयाग में होने वाले कुम्भ मेले में से नागा पंत के महात्मा जंगम बाबा जिन्हें स्वप्न में कई बार इस शक्ति पीठ के दर्शन होते थे। वे रूद्र दन्त पंत के साथ यहां आकर भगवती के लिये मंदिर निर्माण का कार्य शुरू किया। परन्तु उनके आगे समस्या आन पडी मंदिर निर्माण के लिये पत्थरों की। इसी चिंता में एक रात्रि वे अपने शिष्यों के साथ अपनी धूनी के पास बैठकर विचार कर रहे थे। कोई रास्ता नजर न आने पर थके व निढाल बाबा सोचते-सोचते शिष्यों सहित गहरी निद्रा में सो गये तथा स्वप्न में उन्हें महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती रूपी तीन कन्याओं के दर्शन हुये उन्होंने दिव्य मुस्कान के साथ बाबा को स्वप्न में ही अपने साथ उस स्थान पर ले गयी जहां पत्थरों का खजाना था। यह स्थान महाकाली मंदिर के निकट देवदार वृक्षों के बीच घना वन था।

मां महाकाली

        इस स्वप्न को देखते ही बाबा की नींद भंग हुई उन्होंने सभी शिष्यों को जगाया स्वप्न का वर्णन कर रातों-रात चीड़ की लकडी की मशालें तैयार की तथा पूरा शिष्य समुदाय उस स्थान की ओर चल पडा जिसे बाबा ने स्वप्न में देखा था। वहां पहुंचकर रात्रि में ही खुदाई का कार्य आरम्भ किया गया थोड़ी ही खुदान के पश्चात संगमरमर से भी बेहतर पत्थरों की खान निकल आयी। कहते हैं कि पूरा मंदिर, भोग भवन, शिवमंदिर, धर्मशाला एवं मंदिर परिसर का व प्रवेश द्वारों का निर्माण होने के बाद पत्थर की खान स्वतः ही समाप्त हो गयी। आश्चर्य की बात तो यह है इस खान में नौ फिट से भी लम्बे तरासे हुए पत्थर मिले। कितना आलौकिक चमत्कार था यह माता काली का जिस चमत्कार ने सहजता के साथ इस समस्या का निदान करवा दिया। महान योगी जंगम बाबा ने एक सौ बीस वर्ष की आयु में शरीर का त्याग किया।

मां महाकाली

बीसवी सदी के चौथे दशक में गोविन्द दास नामक महा संत ने यहां कालिका की आराधना की आजादी से पूर्व यह दो नदियों के बीच का प्रदेश गंगावली मोटर यातायात से विहीन था। पैदल यात्रा से यात्री यहां की नैसर्गिक सौंदर्य का आनन्द लेते थे। शक्ति पीठ में सहत्रघट का जब कभी पूर्व में आयोजन होता था। तो सरयू व रामगंगा नदी से भक्तजन जयकारा धुन के साथ गागरों में पानी लाते थे। इसके अलावा नौलों, जल धारों से भी ताबें की गंगरियों में जल लाकर के शक्तिपीठ में जलाभिषेक किया जाता था। पूरे दिन चलने वाले इस कार्यक्रम में गंगावली की वादियों का नजारा दिव्य लोक सा मालूम पडता था। सहत्रघट आयोजन तब किया जाता था, जब लम्बे समय से वर्षा नहीं होती थी। दिन भर यह कार्यक्रम सम्पन्न होने के पश्चात सायंकाल के समय घनघोर मेद्य ललाट भरे बादल जो रौद्र रूप का प्रतिबिम्ब मालूम पडता था। अपने साथ वर्षा की अनुपम छटा लाता था। विज्ञान के युग में भी इस परम सत्य का नजारा सहत्रघट आयोजनों के अवसर पर यहां देखा जा सकता है।

मां महाकाली

   एक अन्य चमत्कार के अनुसार विश्व युद्व के दौरान जब भारतीय सैनिकों से खचाखच भरा जहाज समुद्र में डूबने लगा तो उसी जहाज में इस क्षेत्र के उपस्थित एक सैनिक ने माँ का स्मरण कर डूबते जहाज को इस तरह से उबरवाया कि समुद्र की वादियों व जहाज जय श्री महाकाली गंगोलीहाट वाली की जय-जयकार से गूंज उठा तभी से भारतीय सैनिकों की इस मन्दिर के प्रति विशेष आस्था है। बताते हैं कि गंगोलीहाट का काली मंदिर संस्कृति के महाकवि कालीदास की भी तपस्थली रही है। कालिदास के वंशज कौशल्य गोत्र के ब्राह्मण कैलाश यात्रा पथ में रहते हैं। इनके घरों में कालिदास के मेघदूत व रघुवंश की पाण्डुलिपियां मिलती हैं।
भवप्रीता कल्याण रूपा सत्यानंद स्वरूपिणी माता भगवती महाकालिका का यह दरबार अनगिनत, असंख्य अलौकिक दिव्य चमत्कारों से भरा पड़ा है। जिसका वर्णन करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
महाकाली के संदर्भ में एक प्रसिद्व किवदन्ति है कि कालिका का जब रात में डोला चलता है तो इस डोले के साथ कालिका के गण, आंण व बांण की सेना भी चलती हैं। कहते है यदि कोई व्यक्ति इस डोले को छू ले तो दिव्य वरदान का भागी बनता है। हाट गांव के चौधिरयों द्वारा महाकालिका को चढायी गयी 22 नाली खेत में देवी का डोला चलने की बात कही जाती है।

महाकाली मंदिर

       महाआरती के बाद शक्ति के पास महाकाली का विस्तर लगाया जाता है और प्रातः काल विस्तर यह दर्शाता है कि मानों यहां साक्षात् कालिका विश्राम करके गयी हों क्योंकि विस्तर में सलवटें पड़ी रहती हैं। कुछ बुर्जग बताते हैं पशु बलि महाकाली को नहीं दी जाती है। क्योंकि जगतमाता अपने पुत्रों का बलिदान नही लेती है। यह बलि कालिका के खास गण करतु को प्रदान की जाती है। तामानौली के औघड बाबा भी कालिका के अन्यय भक्त रहे हैं। माँ काली के प्रति उनके तमाम किस्से आज भी क्षेत्र में सुने जाते है भगवती महाकाली का यह दरबार असंख्य चमत्कार व किवदन्तियों से भरा पड़ा है। ऐसा माना जाता है कि आज भी मां काली यहां विश्राम को आती है।

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