“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में क्यों पूजा जाता है ?

2017-09-29 02:22:24, comments: 0

 

हिन्दू धरम के अनुसार भगवान शिव को सभी देवों में सर्वोच्च माना गया है | भगवान शिव ही इस जगत के मूल कारक माने गये है | उनका न कोई रूप है और न कोई आकार | भगवान शिव को निराकार माना गया है |

शिवलिंग के रूप में हम उस निराकार शिव तत्व की पूजा करते है जिसमें समस्त ब्रम्हांड का वास है | शिवलिंग पूजा से सभी देवी – देवताओं की पूजा स्वतः ही हो जाती है | शिवलिंग = शिव + लिंग , जिसमे ‘शिव ‘ शब्द का अर्थ परम कल्याणकारी ( सर्वोच्च शक्ति ) और ‘ लिंग ‘ का अर्थ होता है ” सृजन ” (सभी का निर्माण करने वाला ) |

शिवलिंग – भगवान शिव और शक्ति (देवी पार्वती ) के एकल रूप है | जिसमें मूल में देवी पार्वती और उपर स्वंय शिव विद्यमान है | जिस प्रकार से इस ब्रम्हांड में उर्जा और पदार्थ को सभी का मूल कारक माना गया है | उसी प्रकार से शिवलिंग में भगवान शिव को पदार्थ और शक्ति (पार्वती ) को उर्जा माना गया है |

शिवपुराण के अनुसार :-  शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को ही इस संसार की उत्पत्ति का मूल कारण और परब्रह्म कहा गया है | शिवपुराण अनुसार भगवान शिव ही पूर्ण पुरुष है और वे निराकार है | इसीलिए शिवलिंग के रूप में उनके निराकार रूप की पूजा की जाती है | 

भगवान शिव ही एकमात्र ऐसे देव है जिनकी साकार और निराकार दोनों रूपों में पूजा की जाती है | जिसमे उनके निराकार रूप को शिवलिंग के रूप में और उनके साकार रूप को भगवान शंकर (भोलेनाथ ) के रूप में पूजा की जाती है | शिवपुराण अनुसार भगवान शिव की पूजा साकार और निराकार दोनों ही रूपों में परम कल्याणकारी है | किन्तु शिवलिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा विशेष फलदायी है | शिवलिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा करने से जातक को भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है |

पौराणिक कथा : –  सभी देवताओं और राक्षसों द्वारा किये गये समुद्र मंथन के समय अमृत के साथ – साथ विष की उत्पत्ति भी हुई थी | यह विष इतना तीव्र था की पूर्ण मानव जाति का विनाश कर सकता था | तब भगवान शिव ने इस सृष्टि के कल्याण हेतु इस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया | विष के कंठ में धारण करने से शिव जी के शरीर का ताप बहुत बढ़ने लग गया, इसलिए इस ताप के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परम्परा शुरू हुई जो अभी तक चली आ रही है | 

शिव महापुराण अनुसार शिव ही इस जगत के मूल है और शिवलिंग को जल चढाने से सभी देवी – देवता तृप्त हो जाते है  | किन्तु सभी – देवी -देवताओं की तृप्ति से शिव की तृप्ति नहीं होती |

पुराण अनुसार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा ने एक साथ शिव तत्व की आराधना कर उनसे पुछा कि हे शिव,  आप प्रसन्न कैसे होते है ? तो शिव जी ने कहा – मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो | देवऋषि नारद जी ने जब विष्णु को श्राप दिया तब बाद में उन्हें अपनी गलती का पश्चाताप होने लगा तब भगवान विष्णु ने नारद जी को शिवलिंग पूजा के विषय में बताया और सदा शिवभक्तों का सम्मान करने को कहा |

एक पौराणिक कथा अनुसार : – एक बार ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर विवाद होने लगा | जब दोनों एक दुसरे की बातों से सहमत नही हुए तब वे भगवान शिव के पास गये | भगवान शिव अपने साकार रूप से निराकार रूप में प्रकट होकर ( निराकार रूप में सिर्फ एक प्रकाश का पुंज दिखाई दिया ) उन्हें दर्शन देने लगे | तब भगवान विष्णु और ब्रह्मा दोनों ही इस निराकार रूप का आदि और अंत का पता लगाने के लिए निकल पड़े | जगह – जगह सदियों तक घूमने के पश्चात् भी उन्हें इस रूप का कोई आदि या अंत नही दिखाई दिया |

तब ब्रह्मा और विष्णु को अपनी भूल का अहसास हुआ | भगवान शिव अपने साकार रूप में प्रकट होकर बोले – आप दोनों ही समान है | तब शिव बोले अपने ब्रह्म रूप के दर्शन हेतु मै  लिंग रूप में प्रकट हुआ | अतः आज से शिवलिंग के रूप में ही मेरे परमब्रह्म रूप की पूजा होगी |

इस प्रकार शिवलिंग पूजा से भगवान शिव के साकार रूप के साथ – साथ उस शिव -शक्ति की भी पूजा स्वतः ही तो जाती है जो परमब्रह्म है | जो इस सृष्टि की उत्पत्ति का मूल है | वही ” शिव ” है |    
शिवलिंग पूजा विधि : –   सभी भक्तजन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपनी -अपनी श्रद्धा अनुसार शिवलिंग पर जल अर्पित करने के साथ -साथ फल , फूल , मिठाई आदि अर्पित कर उनकी पूजा करते है | इसके साथ -साथ यदि शिवलिंग पूजा रूद्र अभिषेक द्वारा की जाये तो भगवान शिव अति प्रसन्न होते है | शिवलिंग रूद्र अभिषेक किस प्रकार से करें इसके लिए आप इस post को देखे : –  


|| ॐ नमः शिवाय ||

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