“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

भगवान द्वारा खुद ही बछड़ों और ग्वालबालों का रूप बना लेना

2017-09-29 02:18:06, comments: 0

भगवान द्वारा खुद ही बछड़ों और ग्वालबालों का रूप बना लेना (Part-4)
श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 13

जब ब्रह्मा जी ब्रह्मलोक से ब्रज में लौट कर आये। तो उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण, ग्वालबाल और बछड़ों के साथ, एक साल से पहले की भाँति ही क्रीडा कर रहे हैं। वे सोचने लगे - ‘गोकुल में जितने भी ग्वालबाल और बछड़े थे, वे तो मेरी माया-मयी शैय्या पर सो रहे हैं - वे तब से अब तक सचेत नहीं हुए। तब ये उतने ही दूसरे बालक तथा बछड़े कहाँ से आ गये ? ब्रह्मा जी ने दोनों स्थानों पर ग्वालबालों और बछड़ों को देखा, और बहुत देर तक अपनी ज्ञानदृष्टि से उनका रहस्य खोलना चाहा; परन्तु इनमें कौन सच्चे हैं और कौन बनावटी- यह बात वे किसी प्रकार न समझ सके। भगवान की माया में तो सभी मुग्ध हो रहे हैं, परन्तु कोई भी माया-मोह भगवान का स्पर्श नहीं कर सकता। ब्रह्मा जी उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण को अपनी माया से मोहित करने चले थे। किन्तु उनको मोहित करना तो दूर रहा, ब्रह्मा जी अजन्मा होने पर भी अपनी ही माया से मोहित हो गये।
जिस प्रकार रात के घोर अन्धकार में कुहरे के अन्धकार का तथा दिन के प्रकाश में जुगनू के प्रकाश का पता नहीं चलता, वैसे ही क्षुद्र पुरुष द्वारा महापुरुषों पर प्रयोग की गई माया उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती, अपना ही प्रभाव खो बैठती है। ब्रह्मा जी विचार कर ही रहे थे कि उनके देखते-देखते उसी क्षण सभी ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्ण के रूप में दिखायी पड़ने लगे। सब के सब श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, शंख, चक्र, गदा और पद्म से युक्त- चतुर्भुज थे। सबके सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल और कण्ठों में मनोहर हार तथा वनमालाएँ शोभायमान हो रहीं थीं। वक्षःस्थल पर सुवर्ण की सुनहली रेखा- श्रीवत्स, बाहुओं में बाजूबंद, चरणों में नुपुर, कमर में करधनी तथा अँगुलियों में अंगूठियाँ जगमगा रहीं थीं। इस प्रकार ब्रह्मा जी ने देखा कि वे सब उन परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के ही स्वरूप हैं, जिनके प्रकाश से यह सारा जगत प्रकाशित हो रहा है।
यह अत्यन्त आश्चर्यमय दृश्य देखकर ब्रह्मा जी तो चकित रह गये। उनकी ग्यारहों इन्द्रियाँ (पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक मन) क्षुब्ध एवं स्तब्ध रह गयीं। वे भगवान के तेज से निस्तेज होकर मौन हो गये। उस समय वे ऐसे स्तब्ध होकर खड़े रह गये, मानो ब्रज के अधिष्ठातृ-देवता के पास एक पुतली खड़ी हो।

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