“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

पुरामहादेव मंदिर में मिलती है शिवकृपा, जानिए क्या है इतिहास

2017-09-01 19:43:03, comments: 0

 


मंदिर में साल भर शिव भक्तों का आना-जाना लगा रहता है

 सावन के महीने में लोग अक्सर शिव के किसी ऐसे मंदिर में जाकर भगवान शिव की पूजा करना शुभ समझते हैं जहाँ पूजन से उनकी मनोकामना पूरी होती हो। बागपत जिले से सिर्फ 4.5 किलोमीटर दूर बालौनी कसबे के 'पूरा' नाम के गाँव में पुरामहादेव का मंदिर ऐसा ही स्थल है जहाँ साल भर शिव भक्तों का आना-जाना लगा रहता है।

क्या है ऐतिहासिक महत्त्व 

कहा जाता है कि इस स्थान पर भगवान परशुराम के पिता यमदग्नि अपनी पत्नी रेणुका के साथ रहते थे। एक दिन जब ऋषि यमदग्नि घर पर नहीं थे, तब हस्तिनापुर के राजा सहस्र बाहु ऋषि की कुटिया में आये। आश्रम में उपलब्ध कामधेनु गाय की कृपा से रेणुका ने उनकी खूब आवभगत की। जाते समय सहस्र बाहु ने रेणुका से वह गाय मांगी जिसे उन्होंने देने से इंकार कर दिया। जिसके बाद राजा गाय को जबरदस्ती लेने की कोशिश करने लगे, लेकिन वे ऐसा करने में सफल नहीं हो पाए। अंत में राजा ने गाय को छोड़ रेणुका को ही जबरदस्ती अपने साथ ले गए और एक कमरे में बंद कर दिया।

  राजा की रानी को यह बात पसंद नहीं आई और उसने रात में अपनी बहन की मदद से चुपके से रेणुका को आज़ाद कर दिया। वहां से आज़ाद होने के बाद रेणुका सीधे अपने आश्रम पहुंची और यमदग्नि ऋषि को सारी बात बताई। लेकिन ऋषि ने उन्हें कुटिया छोड़कर चले जाने को कहा क्योंकि उनके मुताबिक़ उन्होंने एक रात किसी अन्य पुरुष के साथ बाहर रहकर गलत किया था। ऋषि के बार-बार कहने पर भी जब रेणुका आश्रम से जाने को तैयार नहीं हुईं तब ऋषि ने अपने पुत्रों को उनका सर काट देने को कहा। तीन बड़े पुत्रों ने अपनी ही मां का सर काटने से मना कर दिया, लेकिन ऋषि के चौथे पुत्र परशुराम ने पिता के आदेश का पालन करते हुए अपनी मां का सर काट दिया।

लेकिन अपने कृत्य से अत्यंत क्षुब्ध परशुराम ने आश्रम से कुछ दूर जाकर एक शिवलिंग की स्थापना की और भगवान शिव की पूजा करना शुरू कर दिया।पूजा से प्रसन्न भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने परशुराणम से वरदान मांगने को कहा। जिसपर परशुराम ने कहा कि वे उनकी मां को जीवित कर दें।भगवान शिव ने उनकी माता को जीवन दान दे दिया और उन्हें एक फरसा प्रदान किया। शिव ने कहा कि वे इस फरसे से जिस युद्ध में भाग लेंगे उसमें हमेशा विजयी रहेंगे। इस फरसे से ही भगवान परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों का संहार किया जिनके अत्याचारों से प्रजा परेशान थी।

 जिस स्थल पर उन्होंने भगवान शिव की पूजा की थी, वहीं पर एक विशाल मंदिर बनवाया गया। बाद में यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो गया। एक बार एक रानी अपने काफिले के साथ वहां से गुजरी तो उसके हाथी-घोड़े वहीं रुक गए और आगे बढ़ने से इंकार कर दिया। जब रानी ने वहां पर खुदाई करवाई तो वहां शिवलिंग निकला। शिव की कृपा से रानी ने वहां पर विशाल मंदिर बनवाया जिसे आज पुरामहादेव का मंदिर कहा जाता है।

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