“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

नवरात्र व्रत एवं श्री दुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र महामन्त्र

2017-09-21 19:26:35, comments: 0

 

२१ सितंबर, बृहस्पतिवार से शारदीय नवरात्रि २०१७ का शुभारंभ होने जा रहा है। नौ दिनों तक चलने वाली इस पूजा में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों आराधना की जाती है। नवमी तक प्रतिदिन हम माँ के प्रत्येक रूप का ध्यान, स्तोत्र पाठ तथा कवच का वर्णन करेंगे।

२१ सितंबर २०१७ : मां शैलपुत्री
२२ सितंबर २०१७ : मां ब्रह्मचारिणी
२३ सितंबर २०१७ : मां चन्द्रघंटा
२४ सितंबर २०१७ : मां कूष्मांडा
२५ सितंबर २०१७ : मां स्कंदमाता
२६ सितंबर २०१७ : मां कात्यायनी
२७ सितंबर २०१७ : मां कालरात्रि
२८ सितंबर २०१७ : मां महागौरी
२९ सितंबर २०१७ : मां सिद्धदात्री

पूर्ण नवरात्र उपवास करने में असमर्थ भक्तोंं के लिए श्रीमद्देवीभागवत पुराण में तीन दिन का उपवास भी पूर्ण फल प्रदान करने वाला बताया गया है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी में देवी की पूजा करने से नवरात्र व्रत के सभी फल सुलभ हो जाते हैं :

उपवासे ह्याशाक्ताना नवरात्रे पुन:।
उपोषणत्ररं प्रोक्तं यथोक्तफलदं नृप।।

सप्तम्या च तथाषष्टयां नवम्यां भक्तिभावत:।
त्रिरात्रकरणात्सर्वं फलं भवति पूज्यनात ।।

(श्रीमद्देवीभागवत पुराण, तृतीय स्कंध, अध्याय २७, श्लोक ११-१२)

सप्त श्लोकी दुर्गा महामंत्र का पाठ भी साधक की कामनाओं को पूर्ण करता है।

ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमहामन्त्रस्य

नारायण ऋषिः । अनुष्टुपादीनि छन्दांसि
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः
श्री जगदम्बाप्रीत्यर्थ पाठे विनियोगः

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥१॥

वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं ।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्रयदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्र चित्ता ॥२॥

माँ दुर्गे ! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्धारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं । दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवी ! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो ।

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥३॥

नारायणी ! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हैं, आप ही कल्याणदायिनी शिवा हैं । आप सब पुरुषार्थ्रो को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं । आपको नमस्कार है ।

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥४॥

शरणागतों, दिनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी ! आपको नमस्कार है ।

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमोऽस्तु ते ॥५॥

सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी ! सब भयों से हमारी रक्षा कीजिये ; आपको नमस्कार है ।

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥६॥

देवी ! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हैं । जो लोग आपकी शरण में हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं ; आपकी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं ।

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ॥७॥

सर्वेश्वरि ! आप ऐसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करें और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहें ।

।।जय माता दी ।।
।।ॐ नमो भागवते वासुदेवाय:।।

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