“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

दूध का दूध….. – गुरु नानकदेव जी।

2017-07-02 14:22:41, comments: 0

 

एक बार गुरु नानकदेव जी सैदपुर शहर गए। सारे शहर में ये बात फ़ैल गयी कि एक परम दिव्य महापुरुष पधारे हैं।

शहर का मुखिया ‘मलिक भागो’ अत्याचार और बेईमानी से धनी बना था। वो गरीब किसानों से ना सिर्फ बहुत ज़्यादा लगान वसूलता था बल्कि कई बार उनकी फसल भी हड़प लेता था जिससे कई गरीब किसान भूखे रह जाते थे।

जब मलिक भागो को गुरूजी के आने का पता चला, तो वो उन्हें अपने महल में ठहराना चाहता था। परन्तु, गुरुजी ने एक गरीब बड़ई ‘भाई लालो’ के छोटे से घर को ठहरने के लिए चुना। भाई लालो बहुत खुश हुआ और वो बड़े आदर-सत्कार से गुरूजी की सेवा करने लगा। गुरूजी बड़े प्रेम से उसकी रूखी-सूखी रोटी खाते थे।

जब मलिक भागो को ये पता चला तो उसने एक बड़ा आयोजन किया और इलाके के सभी जानेमाने लोगों के साथ गुरूजी को भी उसमें निमंत्रित किया। पर गुरूजी ने उसका निमंत्रण ठुकरा दिया। ये सुनकर, मलिक को बहुत गुस्सा आया और उसने गुरूजी को अपने यहाँ लाने का हुकुम दिया। मलिक के आदमी, गुरूजी को उसके महल ले कर आये तो मलिक बोला, ” गुरूजी, मैंने आपके ठहरने का बहुत बढ़िया प्रबन्ध किया था और कई सारे स्वादिष्ट व्यंजन भी बनवाये थे, फिर भी आप उस गरीब भाई लालो की सूखी रोटी खा रहे हो, क्यों ? ”

गुरूजी ने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारा भोजन नही खा सकता क्योंकि तुमने अन्यायपूर्ण भ्रष्ट तरीके से गरीबों का खून चूस कर ये रोटी कमाई है जबकि लालो की सूखी रोटी उसकी अपनी सच्ची मेहनत की कमाई की है। ”

गुरूजी की ये बात सुनकर, मलिक भागो आगबबूला हो गया और गुरूजी से इसका सबूत देने को कहा।

गुरूजी ने लालो के घर से रोटी का एक टुकड़ा मंगवाया और फिर शहर के लोगों के भारी जमावड़े के सामने, गुरूजी ने एक हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी और दूसरे हाथ में मलिक भागो की चुपड़ी रोटी उठाई। गुरूजी ने दोनों रोटियों को ज़ोर से हाथोँ में दब�

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