“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

दिवाली के दिन क्यों की जाती है गणेश-लक्ष्मी की पूजा एक साथ? जानिए

2016-10-29 19:38:16, comments: 0
  • दिवाली के अलावा इस त्यौहार को 'कौमुदी महोत्सव' भी कहा जाता है। लेकिन क्या आपने यह जानने की कोशिश की है कि आखिर दिवाली के दिन श्रीगणेश और मां लक्ष्मी की पूजा क्यों की जाती है या इस पर्व से क्या संबंध है। वैसे भी सभी धर्म कार्यों में गणेश जी के साथ तो गौरी जी का पूजन होता है, लेकिन दिवाली पर यहां श्रीगणेश के साथ मां लक्ष्मी का पूजन क्यों किया जाता है? पूर्वजों और पंडितों और कई पौराणिक कथाओं में इस कहानी का जिक्र किया है कि आखिर गणेश और लक्ष्मी की क्यों एक साथ पूजा की जाती है। आज हम आपको बताते हैं कि इसके पीछे की क्या है वजह...

यह है रोचक कथा

पौराणिक ग्रन्थों में एक कथा में प्रमाण मिलता है कि लक्ष्मी जी की पूजा गणेश जी के साथ क्यों होती है। एक बार एक वैरागी साधु को राजसुख भोगने की लालसा हुई उसने लक्ष्मी जी की आराधना की। उसकी आराधना से लक्ष्मी जी प्रसन्न हुईं तथा उसे साक्षात् दर्शन देकर वरदान दिया कि उसे उच्च पद और सम्मान प्राप्त होगा। दूसरे दिन वह वैरागी साधु राज दरबार में पहुंचा। वरदान मिलने के बाद उसे अभिमान हो गया। उसने राजा को धक्का मारा जिससे राजा का मुकुट नीचे गिर गया। राजा व उसके दरबारीगण उसे मारने के लिए दौड़े। परन्तु इसी बीच राजा के गिरे हुए मुकुट से एक कालानाग निकल कर भागने लगा।

सभी चौंक गए और साधु को चमत्कारी समझकर उस की जय जयकार करने लगे। राजा ने प्रसन्न होकर साधु को मंत्री बना दिया, क्योंकि उसी के कारण राजा की जान बची थी। साधु को रहने के लिए अलग से महल दिया गया वह शान से रहने लगा। राजा को एक दिन वह साधु भरे दरबार से हाथ खींचकर बाहर ले गया। यह देख दरबारी जन भी पीछे भागे। सभी के बाहर जाते ही भूकंप आया और भवन खण्डहर में तब्दील हो गया। उसी साधु ने सबकी जान बचाई। अतः साधु का मान-सम्मान बढ़ गया। जिससे उसमें अहंकार की भावना विकसित हो गई।

राजा के महल में एक गणेश जी की प्रतिमा थी। एक दिन साधु ने वह प्रतिमा यह कह कर वहां से हटवा दी कि यह प्रतिमा देखने में बिल्‍कुल अच्छी नहीं है। साधु के इस कार्य से गणेश जी रुष्ठ हो गए। उसी दिन से उस मंत्री बने साधु की बुद्धि बिगड़ गई वह उल्टा पुल्टा करने लगा। तभी राजा ने उस साधू से नाराज होकर उसे कारागार में डाल दिया। साधू जेल में पुनः लक्ष्मीजी की आराधना करने लगा। लक्ष्मी जी ने दर्शन दे कर उससे कहा कि तुमने गणेश जी का अपमान किया है। अतः गणेश जी की आराधना करके उन्हें प्रसन्न करो।

लक्ष्मीजी का आदेश पाकर वह गणेश जी की आराधना करने लगा। इससे गणेश जी का क्रोध शान्त हो गया। गणेश जी ने राजा के स्वप्न में आ कर कहा कि साधु को पुनः मंत्री बनाया जाए। राजा ने गणेश जी के आदेश का पालन किया और साधु को मंत्री पद देकर सुशोभित किया। इस प्रकार लक्ष्मीजी और गणेश जी की पूजा साथ-साथ होने लगी। बुद्धि के देवता गणेश जी की भी उपासना लक्ष्मीजी के साथ अवश्य करनी चाहिए क्योंकि यदि लक्ष्मीजी आ भी जाये तो बुद्धि के उपयोग के बिना उन्हें रोक पाना मुश्किल है। इस प्रकार दीपावली की रात्रि में लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की भी आराधना की जाती है।

यह भी है मान्यता
दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी का पूजन करने में संभवत: एक भावना यह भी कही गई है कि मां लक्ष्मी अपने प्रिय पुत्र की भांति हमारी भी सदैव रक्षा  करें। हमें भी उनका स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहे।

लक्ष्मी जी के साथ गणेश पूजन में इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि गणेश जी को सदा लक्ष्मी जी की बाईं ओर रखें। आदिकाल से ही पत्नी को 'वामांगी' कहा गया है। सदैव बायां स्थान पत्नी को ही दिया जाता है। अत: पूजा करते समय लक्ष्मी-गणेश को इस प्रकार स्थापित करें कि लक्ष्मी जी सदा गणेश जी के दाहिने हो ओर ही रहें, तभी पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होगा।

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