“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

दशा माता व्रत

2015-08-13 16:27:41, comments: 0

प्राचीन ग्रंथों में ऋषी-मुनियों ने अपने अनुभव से सिद्ध किया है कि जब मनुष्य की दशा ठीक होती है तब उसके सब कार्य अनुकूल होते हैं किंतु जब यह प्रतिकूल होती है तब अत्यधिक परेशानी होती है। इसी दशा को दशा भगवती या दशा माता कहा जाता है। हिंदू धर्म में दशा माता की पूजा तथा व्रत करने का विधान है।  दशा माता व्रत की पूजन विधि इस प्रकार है-
पूजन विधि
नौ सूत का कच्चा धागा एवं एक सूत व्रत करने वाली के आंचल से बनाकर उसमें गांठ लगाएं। दिन भर व्रत रखने के बाद शाम को गंडे की पूजन करें। नौ व्रत तक तो शाम को पूजन होता है। दसवें व्रत में दोपहर के पहले ही पूजन कर लिया जाता है। जिस दिन दशा माता का व्रत हो उस दिन पूजा ना होने तक किसी मेहमान का स्वागत नही करें। अन्न न पकाएं।
एक नोंक वाले पान पर चंदन से दशा माता की मूर्ती बनाकर पान के ऊपर गंडे को दूध में डूबों को रख दें। हल्दी, कुंकुम अक्षत से पूजन करें। घी गुड़ का भोग लगाएं। हवन के अंत में दशा माता की कथा अवश्य सुनें। कथा समाप्त होने पर पूजन सामग्री को गीली मिट्टी के पिंड में रखकर मौन होकर उसे कुंआ या तालाब जलाशय में विसर्जित कर दें।
इस प्रकार विधि-विधान पूर्वक पूजन करने से दशा माता प्रसन्न होती हैं तथा अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं।

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