“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

जानियें, श्राद्ध का भोजन पितरो तक - कैसे पहुँचता है

2017-04-09 10:19:04, comments: 0


पुनर्जन्म का सिद्धांत सनातन धर्म का मूल सिद्धांत है। इसके अनुसार ही हमारे अधिकतम धार्मिक कार्य संपादित होतें हैं। हमारे कर्मों के केंद्र में ये जीवन तो रहता ही है किन्तु मरने के बाद की गति भी हमारे कर्मों का केंद्र है। हम मरणोपरांत गति को लक्ष्य करके भी कर्म करतें है। 
हमारे मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि श्राद्ध का भोजन पितरो तक कैसे पहुँचता है ? इस प्रश्न के समाधान के रूप में हमारे शास्त्रों में जो तर्क-सम्मत उत्तर प्रस्तुत किये गए हैं वे इस प्रकार हैं -
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पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे नवीन शरीर में प्रविष्ट होती है। किन्तु तीन पूर्व पुरुषों के पिण्डदान का सिद्धान्त यह बतलाता है कि तीनों पूर्वजों की आत्माएँ 50 या 100 वर्षों के उपरान्त भी वायु में संचरण करते हुए चावल के पिण्डों की सुगन्धि या सारतत्व वायव्य शरीर द्वारा ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। पितामह (पितर) श्राद्ध में दिये गये पिण्डों से स्वयं संतुष्ट होकर अपने वंशजों को जीवन, संतति, सम्पत्ति, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सभी सुख एवं राज्य देते हैं।
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मत्स्यपुराण में ऋषियों द्वारा पूछा गया एक प्रश्न ऐसा आया है कि वह भोजन, जिसे ब्राह्मण (श्राद्ध में आमंत्रित) खाता है या जो कि अग्नि में डाला जाता है, क्या उन मृतात्माओं के द्वारा खाया जाता है? जो (मृत्युपरान्त) अच्छे या बुरे शरीर धारण कर चुके होंगे। 

उत्तर दिया गया है कि पिता, पितामह, प्रपितामह वैदिक उक्तियों के अनुसार, क्रम से “वसुओं”, “रुद्रों” तथा “आदित्यों” के रूप माने गये हैं। इनका नाम एवं गोत्र (श्राद्ध के समय वर्णित), उच्चारित मंत्र एवं श्रद्धा दी गयी आहुतियों को पितरों के पास ले जाते हैं।
यदि किसी के पिता (अपने अच्छे कर्मों के कारण) देवता हो गये हैं, तो श्राद्ध में दिया हुआ भोजन अमृत हो जाता है और वे उनके देवत्व की स्थिति में उनका अनुसरण करता है। यदि वे दैत्य (असुर) हो गये हैं तो वह (श्राद्ध में दिया गया भोजन) उनके पास भाँति-भाँति के आनन्दों के रूप में पहुँचता है। यदि वे पशु हो गये हैं तो वह उनके लिए घास हो जाता है और यदि वे सर्प हो गये हैं तो श्राद्ध का भोजन वायु बनकर उनकी सेवा करता है, आदि। 
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श्राद्धकल्पतरु एक अन्य उत्तर प्रस्तुत करता है इसके अनुसार - वसु, रुद्र आदि ऐसे देवता हैं, जो कि सभी स्थानों पर अपनी पहुँच रखते हैं, अतः पितृ जहाँ पर भी हों वे उन्हें संतुष्ट करने की शक्ति रखते हैं।
ऐसा कहा गया है कि श्राद्ध के समय पितर लोग (आमंत्रित) ब्राह्मणों में वायु रूप में प्रविष्ट हो जाते हैं और जब योग्य ब्राह्मण वस्त्रों, अन्नों, प्रदानों, भक्ष्यों, पेयों, गायों, अश्वों, ग्रामों आदि से सम्पूजित होते हैं तो वे प्रसन्न होते हैं। स्वयं भगवान राम जब वन में पिता दशरथ जी का श्राद्ध करने लगे और ऋषि गण भोजन करने लगे तो सीता जी ने भगवन से कहा कि मैंने तीनो ब्राह्मणों में अग्र में पिता दशरथ जी को और अन्य दो ब्राह्मणों में दो अन्य महापुरुष दिखायी दिए. पितर लोग आमंत्रित ब्राह्मणों में प्रवेश करते हैं।
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मत्स्यपुराण के अनुसार मृत्यु के उपरान्त पितर को 12 दिनों तक पिण्ड देने चाहिए, क्योंकि वे उसकी यात्रा में भोजन का कार्य करते हैं और उसे संतोष देते हैं। आत्मा मृत्यु के उपरान्त 12 दिनों तक अपने आवास को नहीं त्यागती। अतः दस दिनों तक दूध और जल ऊपर टांग देना चाहिए। जिससे सभी यातनाएँ (मृत के कष्ट) दूर हो सकें और यात्रा की थकान मिट सके (मृतात्मा को निश्चित आवास स्वर्ग या यम के लोक में जाना पड़ता है)।

"मृतात्मा, श्राद्ध में 'स्वधा' के साथ प्रदत्त भोजन का पितृलोक में रसास्वादन करता है; चाहे मृतात्मा (स्वर्ग में) देव के रूप में हो, या नरक में हो (यातनाओं के लोक में हो), या निम्न पशुओं की योनि में हो, या मानव रूप में हो, सम्बन्धियों के द्वारा श्राद्ध में प्रदत्त भोजन उसके पास पहुँचता है; जब श्राद्ध सम्पादित होता है तो मृतात्मा एवं श्राद्धकर्ता दोनों को तेज़ या सम्पत्ति या समृद्धि प्राप्त होती है।
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आत्मा इस शरीर को छोड़कर देव या मनुष्य या पशु या सर्प आदि के रूप में अवस्थित हो जाती है तो इस स्थिति के लिए जो अनुमान उपस्थित किया गया है वह यह है कि श्राद्ध में जो अन्न-पान दिया जाता है, वह पितरों के उपयोग के लिए विभिन्न द्रव्यों में परिवर्तित हो जाता है। 

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