“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

चिंतपूर्णी माता मंदिर का निर्माण (Maa Chintpurni Temple Story)

2015-08-20 07:24:42, comments: 0
 
कहते हैं कि इसके बाद भक्त माई दास को महामाया ने सिंह पर सवार होकर अष्टभुज रूप में दर्शन दिए। महामाया ने कहा कि मैं युगों-युगों से इस स्थान पर रह रही हूं और पिंडी  के रूप में विराजमान हूं और छिन्नमस्तिका के नाम से पुकारी जाती हूं। मेरे दर्शनों से तुम्हारी और सभी भक्तों की समस्त कामनाएं पूर्ण होंगी और चिंताओं के भंवर जाल से मुक्ति मिलेगी। भक्तों की चिन्ताएं दूर करने के कारण आज की तिथि से मैं चिंतापूर्णी के नाम से विख्यात होऊंगी। तब माई दास ने कहा -हे देवी! मुझे जप-तप, पूजा-पाठ का ज्ञान नहीं है। मैं किस प्रकार आपकी आराधना करूंगा, फिर न तो यहां जल है न रोटी। उस समय देवी ने स्वयं अपने श्री मुख से कहा- तुम मेरे मूल मंत्र-  
 
 ऊं ऐ हीं क्लीं श्री चामुण्डायै विचै।
 
का जप करो और जाकर पहाड़ के नीचे बड़े पत्थर को उखाड़ो तुम्हें जल की प्राप्ति होगी। 
 
यह कह कर देवी अंतर्धान हो गर्ईं। माई दास ने महामाया की आज्ञा पाकर पत्थर उखाड़ा तो नीचे से शुद्ध और निर्मल जल की धारा फूट निकली। आज भी महामाई की पिंडी का स्नान इसी जल से कराया जाता है। भक्त माई दास ने जिस वट वृक्ष के नीचे विश्राम किया था वह प्राचीन वट वृक्ष आज भी माता की कृपा से पूर्ववत हरा-भरा है। 
 
श्रद्धालु जन इसी वट वृक्ष पर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु मौली बांधते हैं और जब उन्हें मनवांछित फल प्राप्त हो जाता है तो वे मां के दरबार में दर्शनों के उपरांत वट वृक्ष से बांधे हुए धागे खोल लेते हैं। इस जगह पर माता चिंतापूर्णी के भव्य मंदिर का निर्माण हो चुका है और लाखों की संख्या में माता के भक्तजन महामाई का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 
 
वैसे तो चिंतापूर्णी धाम में पूरा वर्ष ही भक्तजनों की भारी भीड़ रहती है लेकिन सावन महीने की अष्टमी और मेले का अपना महात्म्य है। लाखों की संख्या में श्रद्धालु देश के कोने-कोने से महामाई के दर्शनों के लिए आते हैं। 
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