“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

क्यों ब्रम्ह देव की पूजा नही होती ?

2015-08-19 08:00:07, comments: 0

ये कथा उस समयः की जब संसार की उपति नही हुई थी. तभी नारायण (विष्णु) की उत्पति हुई. और कई हजारो वर्षो बाद उनकी नावी से कमल के फुल की उत्पति हुई.. जिस में से ब्रम्ह देव की उत्पति हुई . तभी ब्रम्ह देव की नजर नारायण पर पड़ी. और उन्हों ने नारायण से कहा की कई हजारो वर्ष अकेला इधर उधर भटक रहा था कोई तो है जो मेरे बाद उत्पन हुआ , इस पर नारायण सोचने लगे.
उन दोनों में ये बिबाद होने लगा की कौन किस से पहले आया है किस की उत्पति किस से हुई .. तभी महादेव विशाल लिंग में वहा आये और बोले की तुम दोनों में कौन पहले आया इसका फैसला में करुगा जो बी इस लिंग के अंतिम छोर को ढूंढेगा वही तुम दोनों में से पहले इस संसार में आया है,तभी ब्रम्ह देव ऊपर की तरफ गए और नारायण निचे की ओर. लेकिन अनडू में से किसी को उस लिंग का अंतिम छोर नही मिला. 

तभी महादेव ने पूछा मिला इस लिंग का अंतिम छोर.. भगवान  विष्णु ने कहा ये लिंग तो ज्ञान की तरह है इस का कोई आरम्ब नही है न ही अंत है!

तभी ब्रम्ह देव से पूछा की आप को मिला छोर इस लिंग का , तभी ब्रम्ह देव जी बोले मुझे इस लिंग का छोर ढूंढने की क्या जरुरत है में है आरम्ब हु, मैं ही अंत हु , मुझमे ही ज्ञान है.

तभी भगवान शिव शकर अपने बास्तविक रूप में प्रगट हुए ओर बोले आप दोनों की उत्पति मुझसे हुई है इस लिंग से हुई है! महादेव जी ने ब्रम्ह देव से कहा की आप में ज्ञान का अहंकार है, आप के इस अहंकार के कारण आप को मैं अभिशाप देता हु कि आप इस संसार कि रचना तो करोगे लेकिन  कभी पुज्हे नही जाओगे ! उस दिन से ब्रम्ह देव कि पूजा में प्रतिबंद लग गया 

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