“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

कर्ज में डूबे अमीर भगवान का कर्जा कम कर रहे हैं भक्त

2015-08-04 11:20:06, comments: 0
 
भगवान विष्णु अपने बैकुंठधाम में शयन कर रहे थे। भृगु ऋषि पधारते हैं। भगवान गहरी नींद में होने के कारण ऋषि के स्वागत में तत्पर नहीं हो पाते। क्रोध में आकर ऋषि, भगवान की छाती पर पद-प्रहार कर बैठते हैं, तभी भगवान की आंखें खुलती हैं, वह तुरंत भृगु ऋषि के चरण-कमल हथेलियों से सहलाते हुए पूछते हैं, भगवान! मेरी कठोर छाती से आपकी सुकोमल पगतलियों में चोट तो नहीं आई? और ऋषि पानी-पानी होकर भगवान की विशाल हृदयता को नमन कर उठते हैं।
 
देवी लक्ष्मी इस दृष्टांत को देखकर क्रोधित हो गई और विष्णु लोक को छोड़कर तपस्या में लीन हो गई। चिरकाल तक तपस्या करने के उपरांत उन्होंने अपनी देह का त्याग किया और फिर एक गरीब ब्राह्मण के घर जन्म लिया। भगवान विष्णु को जब पता चला की लक्ष्मी जी के पिता उनका विवाह करने के लिए वर तलाश कर रहे हैं तो वह उनसे विवाह करने की इच्छा से ब्राह्मण के पास गए। 
 
ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का हाथ उनके हाथ में देने के लिए बहुत सारे धन की मांग की। जब से देवी लक्ष्मी विष्णु लोक को छोड़कर गई थी तब से भगवान भी लक्ष्मीहीन हो गए थे। अपनी पत्नी को पुन: पाने के लिए भगवान ने देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेरदेव से धन मांगा।
 
कुबेर धन देने को तो तैयार हो गए लेकिन उसने शर्त रखी की जब तक आप मेरा कर्ज न चुका दें आप केरल में रहेंगे। अन्य मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने कुबेर से कहा था की वे कलियुग के समापन तक ब्याज सहित उनका धन चुका देंगे। तभी से तिरूपति अर्थात् भगवान विष्णु वहां विराजित हैं। कहते हैं कि भक्तों द्वारा अर्पित धन कुबेर देव को प्राप्त होता है और भगवान विष्णु का कर्ज कम होता है। कहते हैं जितना चढ़ावा चढ़ाएंगे उसका दस गुना वापस करते हैँ तिरुपति के बालाजी। 
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