“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

एक ऐसा मंदिर जहां मोबाइल फोन पर भक्तों की पुकार सुनते हैं गणेश जी

2017-09-02 17:50:39, comments: 0

 

गणपति बप्पा सभी देवताओं में भक्तों के लिए सबसे लोक प्रिय हैं साथ ही ये परम्परा भी है कि भगवान गणेश देवताओं में सबसे पहले पूजे जाते हैं। लोग विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा अर्चना कर अपने कष्टों के निवारण के लिए पार्थना करते हैं। भारत के साथ साथ विदेशों में भी भक्त बप्पा को प्रसन्न करने के लिये उनके मंदिर में भिन्न भिन्न तरह से पूजा पाठ करते है और मन्नत मांगते है। लेकिन आज हम आपको भगवान गणेश के ऐसे मंदिर बारे में बताने जा रह है जहां भक्तों को प्रार्थना करने के लिए मंदिर परिसर में जाने की जरूरत नही पड़ती है.. बल्कि लोग मोबाइल फोन के जरिये ही अपनी अर्जी, अपनी विनती गणेश जी तक पहुँचाते हैं।

देश विदेश से पार्थना के लिए आते हैं कॉल

मध्यप्रदेश के जूनी इंदौर में स्थित 1200 साल पुराने इस मंदिर का नाम चिंतामण गणेश मंदिर है। हालांकि इससे पहले बीते चार दशक में यहां भक्तजन पत्रों के माध्यम से अपनी प्रार्थना भगवान गणेश तक पहुंचाते रहे है और इस मंदिर में देश के अनेक हिस्सों के साथ साथ विदेशो से भी पत्र आते थे लेकिन संचारक्रान्ति के इस युग में मंदिर प्रशासन ने भी भक्तों की विनती भगवान तक पहुँचाने के लिए पूराने संचार माध्यम पत्रों के स्थान पर मोबाइल का प्रयोग शुरू कर दिया और जिसके बाद अब मोबाइल कॉल के जरिए लोग अपनी बात भगवान गणेश तक पहुंचा पा रहे हैं।

मोबाइल के जरिये अपनी फरियाद पहुंचाने का ये सिलसिला साल 2005 से शुरू हुआ था जो आज भी जारी है। दरअसल होता यह है कि जब भी कोई भक्त गणेश जी से पार्थना करने की, अपने कष्टों के निवारण के लिए विनती करने इच्छा रखता है तो मंदिर प्रशासन के दिए गए विशेष नम्बर पर कॉल करता है और मंदिर प्रशासन के लोग फोन सीधे गणेश जी की मूर्ति तक ले जाते है और भक्त का संदेश उन तक पहुंचा देते है।

चिंतामण गणेश जी को फोन करने की यह अनोखी परंपरा शुरू होने की पीछे एक जर्मनी में बसे उनके भक्त की कहानी है। इंदौर से संबंध रखने वाला यह भक्त जर्मनी में बसने के बाद हजारों मीलों की दूरी से भी भगवान गणेश को नियमित रूप से चिठ्ठियां लिखा करता था। उस भक्त के लिए मंदिर प्रशासन की तरफ से पहल करते हुए फोन क़ॉल की सुविधा दी गई जिसके बाद दूसरें भक्तों के लिए भी ये परम्परा चल पड़ी।

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