“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

Dhumavati

Dhumavati, The Remover of FrustrationThe seventh Mahavidya is Dhumavati. Here is the story of Her origin. One day Mahadev was sitting in Kailash and Parvati was on his lap. She told Shiva that She was very hungry and requested Him to get Her some food. Shiva asked Her to wait awhile and so saying went back into meditation. Parvati once again asked Shiva, “Hey Father of the Universe, please give me some food, I cannot wait any longer”. When Shiva asked Her to wait a second time, Parvati was so hungry that She became aggressive. The third time this happened, Parvati could bear no more and she ate Shiva to appease Her hunger. Immediately smoke started to come from within Her body. Shiva, who was inside her body, had opened His third eye and He said to Parvati, “Without me, there is no Purusha in the universe, only Prakriti, as only You exist.” For this reason, this is the widow form of the Goddess known as Dhumavati. Dhuma means smoke, and She is depicted without any ornaments and in widow apparel. Dhumavati demonstrates renunciation and removes all frustration and agitation, and is free from disrepute.
7. धूमावती


धूमावती का कोई स्वामी नहीं है। इसलिए यह विधवा माता मानी गई है। इनकी साधना से जीवन में निडरता और निश्चंतता आती है। इनकी साधना या प्रार्थना से आत्मबल का विकास होता है। इस महाविद्या के फल से देवी धूमावती सूकरी के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोग अरिष्ट और शत्रुओं का नाश कर देती है। प्रबल महाप्रतापी तथा सिद्ध पुरूष के रूप में उस साधक की ख्याति हो जाती है।

 

मां धूमावती महाशक्ति स्वयं नियंत्रिका हैं। ऋग्वेद में रात्रिसूक्त में इन्हें 'सुतरा' कहा गया है। अर्थात ये सुखपूर्वक तारने योग्य हैं। इन्हें अभाव और संकट को दूर करने वाली मां कहा गया है।

 

इस महाविद्या की सिद्धि के लिए तिल मिश्रित घी से होम किया जाता है। धूमावती महाविद्या के लिए यह भी जरूरी है कि व्यक्ति सात्विक और नियम संयम और सत्यनिष्ठा को पालन करने वाला लोभ-लालच से दूर रहें। शराब और मांस को छूए तक नहीं।


धूमावती का मंत्र



'ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:'

 
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