“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

Chinnamasta

Listen to the story of Her origin from the Pancharatna Grantha. Once Parvati went with Her friends Dakini and Varnini to take a bath in the Mandakini River. Parvati was feeling very happy and a lot of love was welling up inside Her. Her complexion darkened and the feeling of love completely took over. Her friends on the other hand were hungry and asked Parvati to give them some food. Parvati requested them to wait and said that She would feed them after a while, and began walking. After a short while, Her friends once again appealed to Her, telling Her that She was the Mother of the Universe and they Her children, and asked to be fed quickly. Parvati replied that they should wait until they got home. Her friends could not wait any longer and demanded that their hunger be satisfied immediately. The compassionate Parvati laughed and with her finger nail cut Her own head. Immediately the blood spurted in three directions. Her two friends drank the blood from two of the directions and the Goddess herself drank the blood from the third direction. Since she cut Her own head, she is known as Cinnamasta. Cinnamasta shines like a lightning bolt from the Sun. She demonstrates the rare courage needed to make the highest conceivable sacrifice. May we imbue that very same courage from that daring Goddess!
5. छिन्नमस्ता :- 


इस परिवर्तन शील जगत का अधिपति कबंध है और उसकी शक्ति छिन्नमस्ता है। इनका सिर कटा हुआ और इनके कबंध से रक्त की तीन धाराएं बह रही है। इनकी तीन आंखें हैं और ये मदन और रति पर आसीन है। देवी के गले में हड्डियों की माला तथा कंधे पर यज्ञोपवीत है। इसलिए शांत भाव से इनकी उपासना करने पर यह अपने शांत स्वरूप को प्रकट करती हैं। उग्र रूप में उपासना करने पर यह उग्र रूप में दर्शन देती हैं जिससे साधक के उच्चाटन होने का भय रहता है।

 

माता का स्वरूप अतयंत गोपनीय है। चतुर्थ संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती की सिद्ध प्राप्त हो जाती है। कृष्ण और रक्त गुणों की देवियां इनकी सहचरी हैं। पलास और बेलपत्रों से छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि की जाती है। इससे प्राप्त सिद्धियां मिलने से लेखन बुद्धि ज्ञान बढ़ जाता है। शरीर रोग मुक्त होताते हैं। सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शत्रु परास्त होते हैं। यदि साधक योग, ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक पारंगत होकर विख्यात हो जाता है।

 

कामाख्या के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिके मंदिर काफी लोकप्रिय है। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 79 किलोमीटर की दूरी रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके का यह मंदिर है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है।


छिन्नमस्ता का मंत्र :  


'श्रीं ह्नीं ऎं वज्र वैरोचानियै ह्नीं फट स्वाहा'

 
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